आँखें अंधे कूएँके समान गहरी नितम्ब नदीके करारकी तरह भयंकर; भुजाएँ, जाँघें और पैर नदीके पुलके समान तथा पेट सूखे हुए सरोवरकी भाँति जान पड़ता था॥ १६॥
अन्धकूपगभीराक्षं पुलिनारोहभीषणम्।
बद्धसेतुभुजोर्वङ्घ्रि शून्यतोयह्रदोदरम्॥ १६
आँखें अंधे कूएँके समान गहरी नितम्ब नदीके करारकी तरह भयंकर; भुजाएँ, जाँघें और पैर नदीके पुलके समान तथा पेट सूखे हुए सरोवरकी भाँति जान पड़ता था॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.6.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 158) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/6/16/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1140 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): शून्यतोयहृदोदरम्॥ → शून्यतोयह्रदोदरम्॥