॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.6.11
सा मुञ्च मुञ्चालमिति प्रभाषिणी
निष्पीड्यमानाखिलजीवमर्मणि ।
विवृत्य नेत्रे चरणौ भुजौ मुहुः
प्रस्विन्नगात्रा क्षिपती रुरोद ह॥ ११
sā muñca muñcālamiti prabhāṣiṇī
niṣpīḍyamānākhilajīvamarmaṇi |
vivṛtya netre caraṇau bhujau muhuḥ
prasvinnagātrā kṣipatī ruroda ha|| 11
अर्थ
अब तो पूतनाके प्राणोंके आश्रयभूत सभी मर्मस्थान फटने लगे। वह पुकारने लगी—‘अरे छोड़ दे, छोड़ दे, अब बस कर!’ वह बार-बार अपने हाथ और पैर पटक-पटककर रोने लगी। उसके नेत्र उलट गये। उसका सारा शरीर पसीनेसे लथपथ हो गया॥ ११॥