॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.6.1
अथ षष्ठोऽध्यायः
पूतना-उद्धार
श्रीशुक उवाच
नन्दः पथि वचः शौरेर्न मृषेति विचिन्तयन्।
हरिं जगाम शरणमुत्पातागमशंकितः॥ १
nandaḥ pathi vacaḥ śaurerna mṛṣeti vicintayan|
hariṃ jagāma śaraṇamutpātāgamaśaṃkitaḥ|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! नन्दबाबा जब मथुरासे चले, तब रास्तेमें विचार करने लगे कि वसुदेवजीका कथन झूठा नहीं हो सकता। इससे उनके मनमें उत्पात होनेकी आशंका हो गयी। तब उन्होंने मन-ही-मन ‘भगवान् ही शरण हैं, वे ही रक्षा करेंगे’ ऐसा निश्चय किया॥ १॥✎ 1654