श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.58.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 58 · अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

परमासन आसीनं कृष्णा कृष्णमनिन्दिता।

नवोढा व्रीडिता किंचिच्छनैरेत्याभ्यवन्दत॥ ५

paramāsana āsīnaṃ kṛṣṇā kṛṣṇamaninditā|

navoḍhā vrīḍitā kiṃcicchanairetyābhyavandata|| 5

अर्थ

जब भगवान् श्रीकृष्ण श्रेष्ठ सिंहासनपर विराजमान हो गये; तब परमसुन्दरी श्यामवर्णा द्रौपदी, जो नवविवाहिता होनेके कारण तनिक लजा रही थी, धीरे-धीरे भगवान् श्रीकृष्णके पास आयी और उन्हें प्रणाम किया॥ ५॥

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