श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.58.38

दशम स्कन्ध · अध्याय 58 · अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

अर्चितं पुनरित्याह नारायण जगत्पते।

आत्मानन्देन पूर्णस्य करवाणि किमल्पकः॥ ३८

arcitaṃ punarityāha nārāyaṇa jagatpate|

ātmānandena pūrṇasya karavāṇi kimalpakaḥ|| 38

अर्थ

परीक्षित्! राजा न‌ग्‍नजित‍्ने भगवान् श्रीकृष्णकी विधिपूर्वक अर्चा-पूजा करके यह प्रार्थना की—‘जगत‍्के एकमात्र स्वामी नारायण! आप अपने स्वरूपभूत आनन्दसे ही परिपूर्ण हैं और मैं हूँ एक तुच्छ मनुष्य! मैं आपकी क्या सेवा करूँ?’॥ ३८॥✎ 1693

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1693 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विधि-पूर्वक → विधिपूर्वक

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