श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.58.36

दशम स्कन्ध · अध्याय 58 · अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

वरं विलोक्याभिमतं समागतं

नरेन्द्रकन्या चकमे रमापतिम्।

भूयादयं मे पतिराशिषोऽमलाः

करोतु सत्या यदि मे धृतो व्रतैः॥ ३६

varaṃ vilokyābhimataṃ samāgataṃ

narendrakanyā cakame ramāpatim|

bhūyādayaṃ me patirāśiṣo'malāḥ

karotu satyā yadi me dhṛto vrataiḥ|| 36

अर्थ

राजा न‌ग्‍नजित‍्की कन्या सत्याने देखा कि मेरे चिर-अभिलषित रमारमण भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ पधारे हैं; तब उसने मन-ही-मन यह अभिलाषा की कि ‘यदि मैंने व्रत-नियम आदिका पालन करके इन्हींका चिन्तन किया है तो ये ही मेरे पति हों और मेरी विशुद्ध लालसाको पूर्ण करें’॥ ३६॥✎ 1693

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1693 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विधि-पूर्वक → विधिपूर्वक

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