॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.58.26
सोऽग्निस्तुष्टो धनुरदाद्धयाञ्छ्वेतान् रथं नृप।
अर्जुनायाक्षयौ तूणौ वर्म चाभेद्यमस्त्रिभिः॥ २६
so'gnistuṣṭo dhanuradāddhayāñchvetān rathaṃ nṛpa|
arjunāyākṣayau tūṇau varma cābhedyamastribhiḥ|| 26
अर्थ
खाण्डव-वनका भोजन मिल जानेसे अग्निदेव बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने अर्जुनको गाण्डीव धनुष, चार श्वेत घोड़े, एक रथ, दो अटूट बाणोंवाले तरकस और एक ऐसा कवच दिया, जिसे कोई अस्त्र-शस्त्रधारी भेद न सके॥ २६॥