श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.58.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 58 · अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

कालिन्द्युवाच

अहं देवस्य सवितुर्दुहिता पतिमिच्छती।

विष्णुं वरेण्यं वरदं तपः परममास्थिता॥ २०

ahaṃ devasya saviturduhitā patimicchatī|

viṣṇuṃ vareṇyaṃ varadaṃ tapaḥ paramamāsthitā|| 20

अर्थ

कालिन्दीने कहा—‘मैं भगवान् सूर्यदेवकी पुत्री हूँ। मैं सर्वश्रेष्ठ वरदानी भगवान् विष्णुको पतिके रूपमें प्राप्त करना चाहती हूँ और इसीलिये यह कठोर तपस्या कर रही हूँ॥ २०॥

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