॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.58.14
साकं कृष्णेन सन्नद्धो विहर्तुं विपिनं वनम्।
बहुव्यालमृगाकीर्णं प्राविशत् परवीरहा॥ १४
sākaṃ kṛṣṇena sannaddho vihartuṃ vipinaṃ vanam|
bahuvyālamṛgākīrṇaṃ prāviśat paravīrahā|| 14
अर्थ
परीक्षित्! एक बार वीरशिरोमणि अर्जुनने गाण्डीव धनुष और अक्षय बाणवाले दो तरकस लिये तथा भगवान् श्रीकृष्णके साथ कवच पहनकर अपने उस रथपर सवार हुए, जिसपर वानर-चिह्नसे चिह्नित ध्वजा लगी हुई थी। इसके बाद विपक्षी वीरोंका नाश करनेवाले अर्जुन उस गहन वनमें शिकार खेलने गये, जो बहुत-से सिंह, बाघ आदि भयंकर जानवरोंसे भरा हुआ था॥ १३-१४॥