श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.57.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 57 · अथ सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

एवं सामभिरालब्धः श्‍वफल्कतनयो मणिम्।

आदाय वाससाच्छन्‍नं ददौ सूर्यसमप्रभम्॥ ४०

evaṃ sāmabhirālabdhaḥ śvaphalkatanayo maṇim|

ādāya vāsasācchannaṃ dadau sūryasamaprabham|| 40

अर्थ

परीक्षित्! जब भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार सान्त्वना देकर उन्हें समझाया-बुझाया तब अक्रूरजीने वस्त्रमें लपेटी हुई सूर्यके समान प्रकाशमान वह मणि निकाली और भगवान् श्रीकृष्णको दे दी॥ ४०॥

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