श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.57.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 57 · अथ सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

सत्राजितोऽनपत्यत्वाद् गृह्णीयुर्दुहितुः सुताः।

दायं निनीयापः पिण्डान् विमुच्यर्णं च शेषितम्॥ ३७

satrājito'napatyatvād gṛhṇīyurduhituḥ sutāḥ|

dāyaṃ ninīyāpaḥ piṇḍān vimucyarṇaṃ ca śeṣitam|| 37

अर्थ

आप जानते ही हैं कि सत्राजित्के कोई पुत्र नहीं है। इसलिये उनकी लड़कीके लड़के—उनके नाती ही उन्हें तिलांजलि और पिण्डदान करेंगे, उनका ऋण चुकायेंगे और जो कुछ बच रहेगा, उसके उत्तराधिकारी होंगे॥ ३७॥

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