श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.57.35

दशम स्कन्ध · अध्याय 57 · अथ सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

पूजयित्वाभिभाष्यैनं कथयित्वा प्रियाः कथाः।

विज्ञाताखिलचित्तज्ञः स्मयमान उवाच ह॥ ३५

pūjayitvābhibhāṣyainaṃ kathayitvā priyāḥ kathāḥ|

vijñātākhilacittajñaḥ smayamāna uvāca ha|| 35

अर्थ

भगवान्‌ने उनका खूब स्वागत-सत्कार किया और मीठी-मीठी प्रेमकी बातें कहकर उनसे सम्भाषण किया। परीक्षित्! भगवान् सबके चित्तका एक-एक संकल्प देखते रहते हैं। इसलिये उन्होंने मुसकराते हुए अक्रूरसे कहा—॥ ३५॥

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