॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.57.33
तत्सुतस्तत्प्रभावोऽसावक्रूरो यत्र यत्र ह।
देवोऽभिवर्षते तत्र नोपतापा न मारिकाः॥ ३३
tatsutastatprabhāvo'sāvakrūro yatra yatra ha|
devo'bhivarṣate tatra nopatāpā na mārikāḥ|| 33
अर्थ
उस समय नगरके बड़े-बूढ़े लोगोंने कहा—‘एक बार काशी-नरेशके राज्यमें वर्षा नहीं हो रही थी, सूखा पड़ गया था। तब उन्होंने अपने राज्यमें आये हुए अक्रूरके पिता श्वफल्कको अपनी पुत्री गान्दिनी ब्याह दी। तब उस प्रदेशमें वर्षा हुई। अक्रूर भी श्वफल्कके ही पुत्र हैं और इनका प्रभाव भी वैसा ही है। इसलिये जहाँ-जहाँ अक्रूर रहते हैं, वहाँ-वहाँ खूब वर्षा होती है तथा किसी प्रकारका कष्ट और महामारी आदि उपद्रव नहीं होते।’ परीक्षित्! उन लोगोंकी बात सुनकर भगवान्ने सोचा कि ‘इस उपद्रवका यही कारण नहीं है’ यह जानकर भी भगवान्ने दूत भेजकर अक्रूरजीको ढुँढ़वाया और आनेपर उनसे बातचीत की॥ ३२—३४॥