॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.57.1
अथ सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
स्यमन्तक-हरण, शतधन्वाका उद्धार और अक्रूरजीको फिरसे द्वारका बुलाना
श्रीशुक उवाच
विज्ञातार्थोऽपि गोविन्दो दग्धानाकर्ण्य पाण्डवान्।
कुन्तीं च कुल्यकरणे सहरामो ययौ कुरून्॥ १
vijñātārtho'pi govindo dagdhānākarṇya pāṇḍavān|
kuntīṃ ca kulyakaraṇe saharāmo yayau kurūn|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! यद्यपि भगवान् श्रीकृष्णको इस बातका पता था कि लाक्षागृहकी आगसे पाण्डवोंका बाल भी बाँका नहीं हुआ है, तथापि जब उन्होंने सुना कि कुन्ती और पाण्डव जल मरे, तब उस समयका कुल-परम्परोचित व्यवहार करनेके लिये वे बलरामजीके साथ हस्तिनापुर गये॥ १॥