श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.56.41

दशम स्कन्ध · अध्याय 56 · अथ षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

किं कृत्वा साधु मह्यं स्यान्‍न शपेद् वा जनो यथा।

अदीर्घदर्शनं क्षुद्रं मूढं द्रविणलोलुपम्॥ ४१

kiṃ kṛtvā sādhu mahyaṃ syānna śaped vā jano yathā|

adīrghadarśanaṃ kṣudraṃ mūḍhaṃ draviṇalolupam|| 41

अर्थ

मैं ऐसा कौन-सा काम करूँ, जिससे मेरा कल्याण हो और लोग मुझे कोसें नहीं। सचमुच मैं अदूरदर्शी, क्षुद्र हूँ। धनके लोभसे मैं बड़ी मूढ़ताका काम कर बैठा॥ ४१॥

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