श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.56.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 56 · अथ षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

अभिमृश्यारविन्दाक्षः पाणिना शंकरेण तम्।

कृपया परया भक्तं प्रेमगम्भीरया गिरा॥ ३०

abhimṛśyāravindākṣaḥ pāṇinā śaṃkareṇa tam|

kṛpayā parayā bhaktaṃ premagambhīrayā girā|| 30

अर्थ

परीक्षित्! जब ऋक्षराज जाम्बवान्‍ने भगवान्‌को पहचान लिया, तब कमलनयन श्रीकृष्णने अपने परम कल्याणकारी शीतल करकमलको उनके शरीरपर फेर दिया और फिर अहैतुकी कृपासे भरकर प्रेम-गम्भीर वाणीसे अपने भक्त जाम्बवान्जीसे कहा—॥ २९-३०॥✎ 2114

यह अर्थ श्लोक 29–30 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2114 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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