परीक्षित्! जब ऋक्षराज जाम्बवान्ने भगवान्को पहचान लिया, तब कमलनयन श्रीकृष्णने अपने परम कल्याणकारी शीतल करकमलको उनके शरीरपर फेर दिया और फिर अहैतुकी कृपासे भरकर प्रेम-गम्भीर वाणीसे अपने भक्त जाम्बवान्जीसे कहा—॥ २९-३०॥✎ 2114
यह अर्थ श्लोक 29–30 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
अभिमृश्यारविन्दाक्षः पाणिना शंकरेण तम्।
कृपया परया भक्तं प्रेमगम्भीरया गिरा॥ ३०
परीक्षित्! जब ऋक्षराज जाम्बवान्ने भगवान्को पहचान लिया, तब कमलनयन श्रीकृष्णने अपने परम कल्याणकारी शीतल करकमलको उनके शरीरपर फेर दिया और फिर अहैतुकी कृपासे भरकर प्रेम-गम्भीर वाणीसे अपने भक्त जाम्बवान्जीसे कहा—॥ २९-३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.56.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 489) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/56/30/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)