श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.56.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 56 · अथ षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

कृष्णमुष्टिविनिष्पातनिष्पिष्टांगोरुबन्धनः ।

क्षीणसत्त्वः स्विन्‍नगात्रस्तमाहातीव विस्मितः॥ २५

kṛṣṇamuṣṭiviniṣpātaniṣpiṣṭāṃgorubandhanaḥ |

kṣīṇasattvaḥ svinnagātrastamāhātīva vismitaḥ|| 25

अर्थ

अन्तमें भगवान् श्रीकृष्णके घूँसोंकी चोटसे जाम्बवान्के शरीरकी एक-एक गाँठ टूट-फूट गयी। उत्साह जाता रहा। शरीर पसीनेसे लथपथ हो गया। तब उन्होंने अत्यन्त विस्मित—चकित होकर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—॥ २५॥✎ 2114

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2114 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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