॥ श्रीहरिः ॥
द्वारकायामभूद् राजन् महामोदः पुरौकसाम्।
रुक्मिण्या रमयोपेतं दृष्ट्वा कृष्णं श्रियः पतिम्॥ ६०
dvārakāyāmabhūd rājan mahāmodaḥ puraukasām|
rukmiṇyā ramayopetaṃ dṛṣṭvā kṛṣṇaṃ śriyaḥ patim|| 60
अर्थ
महाराज! भगवती लक्ष्मीजीको रुक्मिणीके रूपमें साक्षात् लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्णके साथ देखकर द्वारकावासी नर-नारियोंको परम आनन्द हुआ॥ ६०॥✎ 892 1689
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे
उत्तरार्धे रुक्मिण्युद्वाहे चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५४॥
द्वारकायामभूद् राजन् महामोदः पुरौकसाम्।
रुक्मिण्या रमयोपेतं दृष्ट्वा कृष्णं श्रियः पतिम्॥ ६०
महाराज! भगवती लक्ष्मीजीको रुक्मिणीके रूपमें साक्षात् लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्णके साथ देखकर द्वारकावासी नर-नारियोंको परम आनन्द हुआ॥ ६०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.54.60 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 481) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/54/60/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
- #892 शब्दोंके बीचका स्थान: लगा।क्यों → लगा। क्यों
- #1689 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: द्वारका-पुरीमें → द्वारकापुरीमें