श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.54.57

दशम स्कन्ध · अध्याय 54 · अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

सिक्तमार्गा मदच्युद्भिराहूतप्रेष्ठभूभुजाम्।

गजैर्द्वास्सु परामृष्टरम्भापूगोपशोभिता॥ ५७

siktamārgā madacyudbhirāhūtapreṣṭhabhūbhujām|

gajairdvāssu parāmṛṣṭarambhāpūgopaśobhitā|| 57

अर्थ

मित्र नरपति आमन्त्रित किये गये थे। उनके मतवाले हाथियोंके मदसे द्वारकाकी सड़क और गलियोंका छिड़काव हो गया था। प्रत्येक दरवाजेपर केलोंके खंभे और सुपारीके पेड़ रोपे हुए बहुत ही भले मालूम होते थे॥ ५७॥✎ 892 1689

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #892 शब्दोंके बीचका स्थान: लगा।क्यों → लगा। क्यों
  • #1689 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: द्वारका-पुरीमें → द्वारकापुरीमें

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