श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.54.51

दशम स्कन्ध · अध्याय 54 · अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

प्राणावशेष उत्सृष्टो द्विड्भिर्हतबलप्रभः।

स्मरन् विरूपकरणं वितथात्ममनोरथः॥ ५१

prāṇāvaśeṣa utsṛṣṭo dviḍbhirhatabalaprabhaḥ|

smaran virūpakaraṇaṃ vitathātmamanorathaḥ|| 51

अर्थ

रुक्मीकी सेना और उसके तेजका नाश हो चुका था। केवल प्राण बच रहे थे। उसके चित्तकी सारी आशा-अभिलाषाएँ व्यर्थ हो चुकी थीं और शत्रुओंने अपमानित करके उसे छोड़ दिया था। उसे अपने विरूप किये जानेकी कष्टदायक स्मृति भूल नहीं पाती थी॥ ५१॥

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