जैसे सोया हुआ पुरुष किसी पदार्थके न होनेपर भी स्वप्नमें भोक्ता, भोग्य और भोगरूप फलोंका अनुभव करता है, उसी प्रकार अज्ञानी लोग झूठमूठ संसार-चक्रका अनुभव करते हैं॥ ४८॥✎ 891
यथा शयान आत्मानं विषयान् फलमेव च।
अनुभुङ्क्तेऽप्यसत्यर्थे तथाऽऽप्नोत्यबुधो भवम्॥ ४८
जैसे सोया हुआ पुरुष किसी पदार्थके न होनेपर भी स्वप्नमें भोक्ता, भोग्य और भोगरूप फलोंका अनुभव करता है, उसी प्रकार अज्ञानी लोग झूठमूठ संसार-चक्रका अनुभव करते हैं॥ ४८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.54.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 479) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/54/48/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)