श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.54.42

दशम स्कन्ध · अध्याय 54 · अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

तवेयं विषमा बुद्धिः सर्वभूतेषु दुर्हृदाम्।

यन्मन्यसे सदाभद्रं सुहृदां भद्रमज्ञवत्॥ ४२

taveyaṃ viṣamā buddhiḥ sarvabhūteṣu durhṛdām|

yanmanyase sadābhadraṃ suhṛdāṃ bhadramajñavat|| 42

अर्थ

अब वे रुक्मिणीजीसे बोले—‘साध्वी! तुम्हारे भाई-बन्धु समस्त प्राणियोंके प्रति दुर्भाव रखते हैं। हमने उनके मंगलके लिये ही उनके प्रति दण्डविधान किया है। उसे तुम अज्ञानियोंकी भाँति अमंगल मान रही हो, यह तुम्हारी बुद्धिकी विषमता है॥ ४२॥✎ 891

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #891 शब्दोंके बीचका स्थान: होतेहैं। → होते हैं।

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