श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.54.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 54 · अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

क्षत्रियाणामयं धर्मः प्रजापतिविनिर्मितः।

भ्रातापि भ्रातरं हन्याद् येन घोरतरस्ततः॥ ४०

kṣatriyāṇāmayaṃ dharmaḥ prajāpativinirmitaḥ|

bhrātāpi bhrātaraṃ hanyād yena ghoratarastataḥ|| 40

अर्थ

फिर रुक्मिणीजीसे बोले—‘साध्वी! ब्रह्माजीने क्षत्रियोंका धर्म ही ऐसा बना दिया है कि सगा भाई भी अपने भाईको मार डालता है। इसलिये यह क्षात्रधर्म अत्यन्त घोर है’॥ ४०॥

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