श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.54.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 54 · अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

तया परित्रासविकम्पितांगया

शुचावशुष्यन्मुखरुद्धकण्ठया ।

कातर्यविस्रंसितहेममालया

गृहीतपादः करुणो न्यवर्तत॥ ३४

tayā paritrāsavikampitāṃgayā

śucāvaśuṣyanmukharuddhakaṇṭhayā |

kātaryavisraṃsitahemamālayā

gṛhītapādaḥ karuṇo nyavartata|| 34

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—रुक्मिणीजीका एक-एक अंग भयके मारे थर-थर काँप रहा था। शोककी प्रबलतासे मुँह सूख गया था, गला रुँध गया था। आतुरतावश सोनेका हार गलेसे गिर पड़ा था और इसी अवस्थामें वे भगवान्‌के चरणकमल पकड़े हुए थीं। परमदयालु भगवान् उन्हें भयभीत देखकर करुणासे द्रवित हो गये। उन्होंने रुक्मीको मार डालनेका विचार छोड़ दिया॥ ३४॥

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