kuṇḍinaṃ na pravekṣyāmi satyametad bravīmi vaḥ|| 20
अर्थ
‘मैं आपलोगोंके बीचमें यह शपथ करता हूँ कि यदि मैं युद्धमें श्रीकृष्णको न मार सका और अपनी बहिन रुक्मिणीको न लौटा सका तो अपनी राजधानी कुण्डिनपुरमें प्रवेश नहीं करूँगा’॥ २०॥
अहत्वा समरे कृष्णमप्रत्यूह्य च रुक्मिणीम्।
कुण्डिनं न प्रवेक्ष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीमि वः॥ २०
‘मैं आपलोगोंके बीचमें यह शपथ करता हूँ कि यदि मैं युद्धमें श्रीकृष्णको न मार सका और अपनी बहिन रुक्मिणीको न लौटा सका तो अपनी राजधानी कुण्डिनपुरमें प्रवेश नहीं करूँगा’॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.54.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 476) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/54/20/