॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.54.17
एवं प्रबोधितो मित्रैश्चैद्योऽगात् सानुगः पुरम्।
हतशेषाः पुनस्तेऽपि ययुः स्वं स्वं पुरं नृपाः॥ १७
evaṃ prabodhito mitraiścaidyo'gāt sānugaḥ puram|
hataśeṣāḥ punaste'pi yayuḥ svaṃ svaṃ puraṃ nṛpāḥ|| 17
अर्थ
परीक्षित्! जब मित्रोंने इस प्रकार समझाया, तब चेदिराज शिशुपाल अपने अनुयायियोंके साथ अपनी राजधानीको लौट गया और उसके मित्र राजा भी, जो मरनेसे बचे थे, अपने-अपने नगरोंको चले गये॥ १७॥