॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.53.23
अहो त्रियामान्तरित उद्वाहो मेऽल्पराधसः।
नागच्छत्यरविन्दाक्षो नाहं वेद्म्यत्र कारणम्।
सोऽपि नावर्ततेऽद्यापि मत्सन्देशहरो द्विजः॥ २३
aho triyāmāntarita udvāho me'lparādhasaḥ|
nāgacchatyaravindākṣo nāhaṃ vedmyatra kāraṇam|
so'pi nāvartate'dyāpi matsandeśaharo dvijaḥ|| 23
अर्थ
‘अहो! अब मुझ अभागिनीके विवाहमें केवल एक रातकी देरी है। परन्तु मेरे जीवनसर्वस्व कमलनयन भगवान् अब भी नहीं पधारे! इसका क्या कारण हो सकता है, कुछ निश्चय नहीं मालूम पड़ता। यही नहीं, मेरे सन्देश ले जानेवाले ब्राह्मणदेवता भी तो अभीतक नहीं लौटे॥ २३॥