श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.51.50

दशम स्कन्ध · अध्याय 51 · अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

प्रमत्तमुच्चैरितिकृत्यचिन्तया

प्रवृद्धलोभं विषयेषु लालसम्।

त्वमप्रमत्तः सहसाभिपद्यसे

क्षुल्लेलिहानोऽहिरिवाखुमन्तकः ॥ ५०

pramattamuccairitikṛtyacintayā

pravṛddhalobhaṃ viṣayeṣu lālasam|

tvamapramattaḥ sahasābhipadyase

kṣullelihāno'hirivākhumantakaḥ || 50

अर्थ

मुझे यह करना चाहिये और यह नहीं करना चाहिये, इस प्रकार विविध कर्तव्य और अकर्तव्योंकी चिन्तामें पड़कर मनुष्य अपने एकमात्र कर्तव्य भगवत्प्राप्तिसे विमुख होकर प्रमत्त हो जाता है, असावधान हो जाता है। संसारमें बाँध रखनेवाले विषयोंके लिये उसकी लालसा दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती ही जाती है। परन्तु जैसे भूखके कारण जीभ लपलपाता हुआ साँप असावधान चूहेको दबोच लेता है, वैसे ही कालरूपसे सदा-सर्वदा सावधान रहनेवाले आप एकाएक उस प्रमादग्रस्त प्राणीपर टूट पड़ते हैं और उसे ले बीतते हैं॥ ५०॥

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