परीक्षित्! वह पुरुष इस प्रकार ठोकर मारकर जगाये जानेसे कुछ रुष्ट हो गया था। उसकी दृष्टि पड़ते ही कालयवनके शरीरमें आग पैदा हो गयी और वह क्षणभरमें जलकर राखका ढेर हो गया॥ १२॥
स तावत्तस्य रुष्टस्य दृष्टिपातेन भारत।
देहजेनाग्निना दग्धो भस्मसादभवत् क्षणात्॥ १२
परीक्षित्! वह पुरुष इस प्रकार ठोकर मारकर जगाये जानेसे कुछ रुष्ट हो गया था। उसकी दृष्टि पड़ते ही कालयवनके शरीरमें आग पैदा हो गयी और वह क्षणभरमें जलकर राखका ढेर हो गया॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.51.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 454) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/51/12/