॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.50.30
स्थित्युद्भवान्तं भुवनत्रयस्य यः
समीहतेऽनन्तगुणः स्वलीलया।
न तस्य चित्रं परपक्षनिग्रह-
स्तथापि मर्त्यानुविधस्य वर्ण्यते॥ ३०
sthityudbhavāntaṃ bhuvanatrayasya yaḥ
samīhate'nantaguṇaḥ svalīlayā|
na tasya citraṃ parapakṣanigraha-
stathāpi martyānuvidhasya varṇyate|| 30
अर्थ
परीक्षित्! भगवान्के गुण अनन्त हैं। वे खेल-खेलमें ही तीनों लोकोंकी उत्पत्ति, स्थिति और संहार करते हैं। उनके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है कि वे शत्रुओंकी सेनाका इस प्रकार बात-की-बातमें सत्यानाश कर दें। तथापि जब वे मनुष्यका-सा वेष धारण करके मनुष्यकी-सी लीला करते हैं, तब उसका भी वर्णन किया ही जाता है॥ ३०॥✎ 1999 2108