श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.50.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 50 · अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

हरिः परानीकपयोमुचां मुहुः

शिलीमुखात्युल्बणवर्षपीडितम् ।

स्वसैन्यमालोक्य सुरासुरार्चितं

व्यस्फूर्जयच्छार्ङ्गशरासनोत्तमम् ॥ २३

hariḥ parānīkapayomucāṃ muhuḥ

śilīmukhātyulbaṇavarṣapīḍitam |

svasainyamālokya surāsurārcitaṃ

vyasphūrjayacchārṅgaśarāsanottamam || 23

अर्थ

जब भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि शत्रु-सेनाके वीर हमारी सेनापर इस प्रकार बाणोंकी वर्षा कर रहे हैं, मानो बादल पानीकी अनगिनत बूँदें बरसा रहे हों और हमारी सेना उससे अत्यन्त पीड़ित, व्यथित हो रही है; तब उन्होंने अपने देवता और असुर—दोनोंसे सम्मानित शार्ङ्गधनुषका टंकार किया॥ २३॥✎ 1999 2108

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1999 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): दीप- → द्वीप-
  • #2108 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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