श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.50.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 50 · अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

ततोऽभूत् परसैन्यानां हृदि वित्रासवेपथुः।

तावाह मागधो वीक्ष्य हे कृष्ण पुरुषाधम॥ १७

tato'bhūt parasainyānāṃ hṛdi vitrāsavepathuḥ|

tāvāha māgadho vīkṣya he kṛṣṇa puruṣādhama|| 17

अर्थ

उनके शंखकी भयंकर ध्वनि सुनकर शत्रुपक्षकी सेनाके वीरोंका हृदय डरके मारे थर्रा उठा। उन्हें देखकर मगधराज जरासन्धने कहा—‘पुरुषाधम कृष्ण! तू तो अभी निरा बच्चा है। अकेले तेरे साथ लड़नेमें मुझे लाज लग रही है। इतने दिनोंतक तू न जाने कहाँ-कहाँ छिपा फिरता था। मन्द! तू तो अपने मामाका हत्यारा है। इसलिये मैं तेरे साथ नहीं लड़ सकता। जा, मेरे सामनेसे भाग जा॥ १७-१८॥

यह अर्थ श्लोक 17–18 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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