श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.5.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

नूनं ह्यदृष्टनिष्ठोऽयमदृष्टपरमो जनः।

अदृष्टमात्मनस्तत्त्वं यो वेद न स मुह्यति॥ ३०

nūnaṃ hyadṛṣṭaniṣṭho'yamadṛṣṭaparamo janaḥ|

adṛṣṭamātmanastattvaṃ yo veda na sa muhyati|| 30

अर्थ

इसमें सन्देह नहीं कि प्राणियोंका सुख-दुःख भाग्यपर ही अवलम्बित है। भाग्य ही प्राणीका एकमात्र आश्रय है। जो जान लेता है कि जीवनके सुख-दुःखका कारण भाग्य ही है, वह उनके प्राप्त होनेपर मोहित नहीं होता॥ ३०॥

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