श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.49.1

दशम स्कन्ध · अध्याय 49 · अथैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

अथैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

अक्रूरजीका हस्तिनापुर जाना

श्रीशुक उवाच

स गत्वा हास्तिनपुरं पौरवेन्द्रयशोऽङ्कितम्।

ददर्श तत्राम्बिकेयं सभीष्मं विदुरं पृथाम्॥ १

sa gatvā hāstinapuraṃ pauravendrayaśo'ṅkitam|

dadarśa tatrāmbikeyaṃ sabhīṣmaṃ viduraṃ pṛthām|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्‌के आज्ञानुसार अक्रूरजी हस्तिनापुर गये। वहाँकी एक-एक वस्तुपर पुरुवंशी नरपतियोंकी अमरकीर्तिकी छाप लग रही है। वे वहाँ पहले धृतराष्ट्र, भीष्म, विदुर, कुन्ती, बाह्लीक और उनके पुत्र सोमदत्त, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, दुर्योधन, द्रोणपुत्र अश्‍वत्थामा, युधिष्ठिर आदि पाँचों पाण्डव तथा अन्यान्य इष्ट-मित्रोंसे मिले॥ १-२॥✎ 1435 1436

यह अर्थ श्लोक 1–2 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1435 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हस्तिनापुर-वासियोंके → हस्तिनापुरवासियोंके
  • #1436 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अश्‍व-त्थामा, → अश्‍वत्थामा,

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