‘भगवन्! यह बड़े ही आनन्द और सौभाग्यकी बात है कि पापी कंस अपने अनुयायियोंके साथ मारा गया। उसे मारकर आप दोनोंने युदवंशको बहुत बड़े संकटसे बचा लिया है तथा उन्नत और समृद्ध किया है॥ १७॥✎ 1680
दिष्ट्या पापो हतः कंसः सानुगो वामिदं कुलम्।
भवद्भ्यामुद्धृतं कृच्छ्राद् दुरन्ताच्च समेधितम्॥ १७
‘भगवन्! यह बड़े ही आनन्द और सौभाग्यकी बात है कि पापी कंस अपने अनुयायियोंके साथ मारा गया। उसे मारकर आप दोनोंने युदवंशको बहुत बड़े संकटसे बचा लिया है तथा उन्नत और समृद्ध किया है॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.48.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 437) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)