श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

निस्स्वं त्यजन्ति गणिका अकल्पं नृपतिं प्रजाः।

अधीतविद्या आचार्यमृत्विजो दत्तदक्षिणम्॥ ७

nissvaṃ tyajanti gaṇikā akalpaṃ nṛpatiṃ prajāḥ|

adhītavidyā ācāryamṛtvijo dattadakṣiṇam|| 7

अर्थ

जब वेश्या समझती है कि अब मेरे यहाँ आनेवालेके पास धन नहीं है, तब उसे वह धता बता देती है। जब प्रजा देखती है कि यह राजा हमारी रक्षा नहीं कर सकता, तब वह उसका साथ छोड़ देती है। अध्ययन समाप्त हो जानेपर कितने शिष्य अपने आचार्योंकी सेवा करते हैं? यज्ञकी दक्षिणा मिली कि ऋत्विजलोग चलते बने॥ ७॥

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