श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

अन्येष्वर्थकृता मैत्री यावदर्थविडम्बनम्।

पुम्भिः स्त्रीषु कृता यद्वत् सुमनस्स्विव षट्पदैः॥ ६

anyeṣvarthakṛtā maitrī yāvadarthaviḍambanam|

pumbhiḥ strīṣu kṛtā yadvat sumanassviva ṣaṭpadaiḥ|| 6

अर्थ

दूसरोंके साथ जो प्रेम-सम्बन्धका स्वाँग किया जाता है, वह तो किसी-न-किसी स्वार्थके लिये ही होता है। भौंरोंका पुष्पोंसे और पुरुषोंका स्त्रियोंसे ऐसा ही स्वार्थका प्रेम-सम्बन्ध होता है॥ ६॥

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