॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.47.42
अपि स्मरति नः साधो गोविन्दः प्रस्तुते क्वचित्।
गोष्ठीमध्ये पुरस्त्रीणां ग्राम्याः स्वैरकथान्तरे॥ ४२
api smarati naḥ sādho govindaḥ prastute kvacit|
goṣṭhīmadhye purastrīṇāṃ grāmyāḥ svairakathāntare|| 42
अर्थ
दूसरी गोपियाँ बोलीं—‘साधो! आप यह तो बतलाइये कि जब कभी नागरी नारियोंकी मण्डलीमें कोई बात चलती है और हमारे प्यारे स्वच्छन्दरूपसे, बिना किसी संकोचके जब प्रेमकी बातें करने लगते हैं, तब क्या कभी प्रसंगवश हम गँवार ग्वालिनों-की भी याद करते हैं?’॥ ४२॥