तबतक दूसरी गोपी बोल उठी—‘अरी सखी! हमारे प्यारे श्यामसुन्दर तो प्रेमकी मोहिनी कलाके विशेषज्ञ हैं। सभी श्रेष्ठ स्त्रियाँ उनसे प्यार करती हैं, फिर भला जब नगरकी स्त्रियाँ उनसे मीठी-मीठी बातें करेंगी और हाव-भावसे उनकी ओर देखेंगी तब वे उनपर क्यों न रीझेंगे?’॥ ४१॥
कथं रतिविशेषज्ञः प्रियश्च वरयोषिताम्।
नानुबध्येत तद्वाक्यैर्विभ्रमैश्चानुभाजितः॥ ४१
तबतक दूसरी गोपी बोल उठी—‘अरी सखी! हमारे प्यारे श्यामसुन्दर तो प्रेमकी मोहिनी कलाके विशेषज्ञ हैं। सभी श्रेष्ठ स्त्रियाँ उनसे प्यार करती हैं, फिर भला जब नगरकी स्त्रियाँ उनसे मीठी-मीठी बातें करेंगी और हाव-भावसे उनकी ओर देखेंगी तब वे उनपर क्यों न रीझेंगे?’॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.47.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 429) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/41/