श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.46.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 46 · अथ षट्चत्वारिंशोऽध्यायः

धारयन्त्यतिकृच्छ्रेण प्रायः प्राणान् कथंचन।

प्रत्यागमनसन्देशैर्बल्लव्यो मे मदात्मिकाः॥ ६

dhārayantyatikṛcchreṇa prāyaḥ prāṇān kathaṃcana|

pratyāgamanasandeśairballavyo me madātmikāḥ|| 6

अर्थ

मेरी गोपियाँ, मेरी प्रेयसियाँ इस समय बड़े ही कष्ट और यत्‍नसे अपने प्राणोंको किसी प्रकार रख रही हैं। मैंने उनसे कहा था कि ‘मैं आऊँगा।’ वही उनके जीवनका आधार है। उद्धव! और तो क्या कहूँ, मैं ही उनकी आत्मा हूँ। वे नित्य-निरन्तर मुझमें ही तन्मय रहती हैं’॥ ६॥

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