श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.46.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 46 · अथ षट्चत्वारिंशोऽध्यायः

मयि ताः प्रेयसां प्रेष्ठे दूरस्थे गोकुलस्त्रियः।

स्मरन्त्योऽङ्ग विमुह्यन्ति विरहौत्कण्ठ्यविह्वलाः॥ ५

mayi tāḥ preyasāṃ preṣṭhe dūrasthe gokulastriyaḥ|

smarantyo'ṅga vimuhyanti virahautkaṇṭhyavihvalāḥ|| 5

अर्थ

प्रिय उद्धव! मैं उन गोपियोंका परम प्रियतम हूँ। मेरे यहाँ चले आनेसे वे मुझे दूरस्थ मानती हैं और मेरा स्मरण करके अत्यन्त मोहित हो रही हैं, बार-बार मूर्च्छित हो जाती हैं। वे मेरे विरहकी व्यथासे विह्वल हो रही हैं, प्रतिक्षण मेरे लिये उत्कण्ठित रहती हैं॥ ५॥

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