श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.46.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 46 · अथ षट्चत्वारिंशोऽध्यायः

न ह्यस्यास्ति प्रियः कश्‍चिन्‍नाप्रियो वास्त्यमानिनः।

नोत्तमो नाधमो नापि समानस्यासमोऽपि वा॥ ३७

na hyasyāsti priyaḥ kaścinnāpriyo vāstyamāninaḥ|

nottamo nādhamo nāpi samānasyāsamo'pi vā|| 37

अर्थ

एक शरीरके प्रति अभिमान न होनेके कारण न तो कोई उनका प्रिय है और न तो अप्रिय। वे सबमें और सबके प्रति समान हैं; इसलिये उनकी दृष्टिमें न तो कोई उत्तम है और न तो अधम। यहाँतक कि विषमताका भाव रखनेवाला भी उनके लिये विषम नहीं है॥ ३७॥

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