श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.46.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 46 · अथ षट्चत्वारिंशोऽध्यायः

यस्मिञ्जनः प्राणवियोगकाले

क्षणं समावेश्य मनो विशुद्धम्।

निर्हृत्य कर्माशयमाशु याति

परां गतिं ब्रह्ममयोऽर्कवर्णः॥ ३२

yasmiñjanaḥ prāṇaviyogakāle

kṣaṇaṃ samāveśya mano viśuddham|

nirhṛtya karmāśayamāśu yāti

parāṃ gatiṃ brahmamayo'rkavarṇaḥ|| 32

अर्थ

जो जीव मृत्युके समय अपने शुद्ध मनको एक क्षणके लिये भी उनमें लगा देता है, वह समस्त कर्म-वासनाओंको धो बहाता है और शीघ्र ही सूर्यके समान तेजस्वी तथा ब्रह्ममय होकर परमगतिको प्राप्त होता है॥ ३२॥

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