श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.46.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 46 · अथ षट्चत्वारिंशोऽध्यायः

उद्धव उवाच

युवां श्‍लाघ्यतमौ नूनं देहिनामिह मानद।

नारायणेऽखिलगुरौ यत् कृता मतिरीदृशी॥ ३०

yuvāṃ ślāghyatamau nūnaṃ dehināmiha mānada|

nārāyaṇe'khilagurau yat kṛtā matirīdṛśī|| 30

अर्थ

उद्धवजीने कहा—हे मानद! इसमें सन्देह नहीं कि आप दोनों समस्त शरीरधारियोंमें अत्यन्त भाग्यवान् हैं, सराहना करनेयोग्य हैं। क्योंकि जो सारे चराचर जगत‍्के बनानेवाले और उसे ज्ञान देनेवाले नारायण हैं, उनके प्रति आपके हृदयमें ऐसा वात्सल्यस्नेह—पुत्रभाव है॥ ३०॥

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