श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

मातरं पितरं वृद्धं भार्यां साध्वीं सुतं शिशुम्।

गुरुं विप्रं प्रपन्‍नं च कल्पोऽबिभ्रच्छ्वसन् मृतः॥ ७

mātaraṃ pitaraṃ vṛddhaṃ bhāryāṃ sādhvīṃ sutaṃ śiśum|

guruṃ vipraṃ prapannaṃ ca kalpo'bibhracchvasan mṛtaḥ|| 7

अर्थ

जो पुरुष समर्थ होकर भी बूढ़े माता-पिता, सती पत्‍नी, बालक, सन्तान, गुरु, ब्राह्मण और शरणागतका भरण-पोषण नहीं करता—वह जीता हुआ भी मुर्देके समान ही है!॥ ७॥

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