वृत्तिं न दद्यात्तं प्रेत्य स्वमांसं खादयन्ति हि॥ ६
yastayorātmajaḥ kalpa ātmanā ca dhanena ca|
vṛttiṃ na dadyāttaṃ pretya svamāṃsaṃ khādayanti hi|| 6
अर्थ
जो पुत्र सामर्थ्य रहते भी अपने माँ-बापकी शरीर और धनसे सेवा नहीं करता, उसके मरनेपर यमदूत उसे उसके अपने शरीरका मांस खिलाते हैं॥ ६॥
यस्तयोरात्मजः कल्प आत्मना च धनेन च।
वृत्तिं न दद्यात्तं प्रेत्य स्वमांसं खादयन्ति हि॥ ६
जो पुत्र सामर्थ्य रहते भी अपने माँ-बापकी शरीर और धनसे सेवा नहीं करता, उसके मरनेपर यमदूत उसे उसके अपने शरीरका मांस खिलाते हैं॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.45.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 408) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/45/6/