श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.50

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

समनन्दन् प्रजाः सर्वा दृष्ट्वा रामजनार्दनौ।

अपश्यन्त्यो बह्वहानि नष्टलब्धधना इव॥ ५०

samanandan prajāḥ sarvā dṛṣṭvā rāmajanārdanau|

apaśyantyo bahvahāni naṣṭalabdhadhanā iva|| 50

अर्थ

मथुराकी प्रजा बहुत दिनोंतक श्रीकृष्ण और बलरामको न देखनेसे अत्यन्त दुःखी हो रही थी। अब उन्हें आया हुआ देख सब-के-सब परमानन्दमें म‌ग्‍न हो गये, मानो खोया हुआ धन मिल गया हो॥ ५०॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे
गुरुपुत्रानयनं नाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४५॥

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