श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.35

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

सर्वं नरवरश्रेष्ठौ सर्वविद्याप्रवर्तकौ।

सकृन्‍निगदमात्रेण तौ संजगृहतुर्नृप॥ ३५

sarvaṃ naravaraśreṣṭhau sarvavidyāpravartakau|

sakṛnnigadamātreṇa tau saṃjagṛhaturnṛpa|| 35

अर्थ

परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम सारी विद्याओंके प्रवर्तक हैं। इस समय केवल श्रेष्ठ मनुष्यका-सा व्यवहार करते हुए ही वे अध्ययन कर रहे थे। उन्होंने गुरुजीके केवल एक बार कहनेमात्रसे सारी विद्याएँ सीख लीं॥ ३५॥

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