श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

प्रभवौ सर्वविद्यानां सर्वज्ञौ जगदीश्‍वरौ।

नान्यसिद्धामलज्ञानं गूहमानौ नरेहितैः॥ ३०

prabhavau sarvavidyānāṃ sarvajñau jagadīśvarau|

nānyasiddhāmalajñānaṃ gūhamānau narehitaiḥ|| 30

अर्थ

श्रीकृष्ण और बलराम जगत‍्के एकमात्र स्वामी हैं। सर्वज्ञ हैं। सभी विद्याएँ उन्हींसे निकली हैं। उनका निर्मल ज्ञान स्वतःसिद्ध है। फिर भी उन्होंने मनुष्यकी-सी लीला करके उसे छिपा रखा था॥ ३०॥

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