॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.45.1
अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः
श्रीकृष्ण-बलरामका यज्ञोपवीत और गुरुकुलप्रवेश
श्रीशुक उवाच
पितरावुपलब्धार्थौ विदित्वा पुरुषोत्तमः।
मा भूदिति निजां मायां ततान जनमोहिनीम्॥ १
pitarāvupalabdhārthau viditvā puruṣottamaḥ|
mā bhūditi nijāṃ māyāṃ tatāna janamohinīm|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि माता-पिताको मेरे ऐश्वर्यका, मेरे भगवद्भावका ज्ञान हो गया है, परंतु इन्हें ऐसा ज्ञान होना ठीक नहीं, (इससे तो ये पुत्र-स्नेहका सुख नहीं पा सकेंगे—) ऐसा सोचकर उन्होंने उनपर अपनी वह योगमाया फैला दी, जो उनके स्वजनोंको मुग्ध रखकर उनकी लीलामें सहायक होती है॥ १॥